Sunday, May 31, 2020

मेरी कविता,मेरा अस्तित्व

मेरी कविता,कुछ छंदबद्ध कुछ छंदमुक्त
बोलती हैं मुझसे ,अभी मैं अपरिपक्व हूं
अभी और रंग भरो इसमें
और लय दो,और संवारो मुझे दुल्हन की तरह।
और नए शब्द गढ़ो
और पारदर्शी करो आँखों की पुतलियों सी।।
मेरी कविता,मैंने कहा- मत हो गतिमान
चल सीधी सपाट सरल सी
मत दिखा व्यग्रता सबसे अलग हो जाने की
मिल जा सबमे अनमिल सी होकर।
मेरी कविता,मत रूठना मुझसे
तुझसे मेरा अस्तित्व है
तू मुझमे है।लोग हँसते है,हंसने दो।
कुछ समय बाद हो जाओगी तुम कालातीत
मेरी कविता, पी लेना विष के घूंठ।
पर रहना उन्मुक्त, स्वछन्द, खुद मेँ खोये
पूछना अपनी आत्मा से
क्या कवित्व की पंक्तियाँ सिकुड़ रही हैं?
क्या क्षितिज के उस पार से
कोई है जो तुझे सजा रहा है
पीत रौशनी की गझिन आभा से?
- पदमा

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