Sunday, May 31, 2020

स्तब्ध हूं

स्तब्ध हूं, निःशब्द हूं, व्याकुल हूं, शोकाकुल हूं।।
मन करता है आज, उड़ेल डालूं विचारों को,
जो अब तक है मन में भरा,
खोल डालूं जीवन की किताब,
जो अब तक था कहीं धरा।।
मासूम हृदय हम मानव का,
लग जाते हैं जल्दी यहाँ घाव,
मौत ही तो है ,वो आएगी,रुलायेगी,ले जाएगी।।
महसूस हो रहा यूँ,जैसे कई परिंदे एक साथ जगत को छोड़ चले हैं,
कई कोशिशें नाकाम हो रही हैं,
कहीं कोई हलचल नहीं, कहीं कोई अकुलाहट है,
जो कर रही मन को विकल।।
आज लगा, जिंदगी अपना रास्ता खुद चुनती है।।
अभी अभी तो सफलता ने मुझे पुकारा था।।
फिर हे प्रभु!क्यों सब कुछ मौन है?
क्यों थिर है राहें?
क्यों हम सब हार रहे प्रकृति से?
हे आराध्य, तोड़ो अब मौन को,
खोलो मंदिरों के पट,
विराजो फिर पहाड़ों पर,
अब व्यस्त होने का मन करता है,
अब उड़ने का मन करता है।।
बहुत हो गया,रुक जाओ परिदों,न जाओ।।
जीवन से भरी आँखें, तू कौन है?
हो रहा आज क्यों तू मौन है?

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