नही देखती अब रामायण,
नही हैं राम मेरे आदर्श।!
रघुकुल रीत सदा चली आयी,
प्राण जाये पर वचन न जाई।।
फिर हे राम क्यों वचन नहीं निभाया सीता से,
वन गमन की साथी थीं वो,
सात जन्मों का वादा था,हिय की प्रतिमा थीं सीता,
राम ने कहाँ रोका?
क्या प्रेम नहीं उपजा जब वंश बेल पुष्पित हुआ?
हृदय के साथी को छोड़ क्यों वन में छोड़ा उनको,
क्या राजधर्म निभाने में मन की व्यथा भूल गए?
या पुरुषोत्तम कहलाने को ,दूर कर दिया प्रियतमा को।।
क्यों मिथिला की बेटी ,रानी से यूँ रंक बनी,
चुभते होंगे जिनको पुष्प, अब पाषाण बना बिछौना।।
पिता की प्यारी, माँ की राजदुलारी,
काटा क्यों वनवास?जीवन की सहचरी को क्यों राम ने दूर किया,
क्या किसी के कहने भर से मन मैला हो जाता है?
पूछ लेते अगर एक बार, कि
हे सीता!क्या ये सच है?
शायद फिर न देतीं वो अग्नि परीक्षा।।
क्यों राम! स्री ही क्यों दे अग्नि परीक्षा!
क्यों नहीं कहते की सीता तुम सदैव मेरी ही रहोगी।।
अब नहीं दोगी अग्नि परीक्षा, अब नहीं सहोगी एकांकीपन।।
अब नहीं रोएंगे कोई जनक,
अब ना होगा किसी माता का हृदय विकल।।

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