Friday, May 29, 2020

तारों की दास्ताँ

अम्बर के आगोश में समाये असंख्य
टंके तारों की दास्ताँ
सुनी राहों को जुगनुओं की सी रौशनी से नहाते
सितारों के दृगों के पोरों से ढुलक पड़ते हैं कुछ मोती
अम्बर चुनता जाता उन्हें अपनी भावुक अंजुलियों में।
रोज बदलती चेतना और परिदृश्य
विचलित कर देते नभ के विशाल मन को
कुछ फांके से गहरा रहे अम्बर और तारों बीच
उसके सजल अक्षि। तलाशते हैं कुछ टुकड़े तारों के
समेट लेने की चाह में और फैलाता जाता अपनी भुजा को।
मैंने आज कहा बिखरते आकाश को
मत तलाशो उसे जो खो गया
सहेजो उसे जो अनथक अगाध विशुद्ध तुम्हारे आज में खड़ा है
जो बीत गया इतिहास है
आने वाला पल ही खास है
मत रोओ टूटे तारों
आज को संवारो
है अमर कथन,जीवन मरण
आनेवाला ही जाता है
बोलो, कब अम्बर शोक मनाता है।।
-अपनों के लिए समर्पित मेरी एक छोटी कविता।
पदमा

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