सबकुछ भरा है,फिरभी कहीं खाली हूं
जीवन से भरपूर, फिर भी किरचियों में धँसी
आशा और विश्वास से भरी।
पर कहीं दूर किलसती आहें भी हैं
बहार से थिर, भीतर से कुछ टूट रहा।
सब साथ हैं,फिर भी कहीं अकेली हूं।
हंसी हैँ, ठहाके हैं,पर उदासी की परतों से घिरी।
राहों पर गुजरती जाती हूं रोज
पर कहीं कोई थकन है।
कहीं कोई आस है जो साँस दे रहा है मुझे
कहीं कोई है जो भावों के तार को
पिघला रहा है मुझे शीशे सा।
कुछ तो है जो रोक रहा है मुझे
पुकार रहा मुझे।
चीखती हुई सड़कों पर भाग रहा कोई
शाम के धुंधलके में,
जीवन की आशा की डोर खींचे
कोई कह रहा ,भागो दौड़ो,मत रोको खुद को
डूबा लो स्वयं को स्वयं में
यही सत्य है,यही तय है,यही जीवन है,यही लय है।।

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