Sunday, May 31, 2020

मन के कोरे कागज पर

पलट रही हूं पन्ने दर पन्ने,
शब्द आज कुछ रूठे से हैं।
शायद कहना चाह रहे हैं,कोरे ही रहने दो मुझे।
मत सजाओ मुझे स्याही की लकीरों से।
सहज ही रहने दो,मत खींचो तस्वीर।
आज रुक जाओ मत करो मन के तार झंकृत।
हो जाने दो मुझे सँवेदनहीन,
सुनने दो कुछ आहट, और गहराने दो कोरेपन को।
मैं भी नि:शब्द हूं पन्ने की इस वेदना को सुनकर।।
शायद अच्छा है मुझसे ये पन्ना।
कम से कम ले पाते हैं साँस कोरे रहकर।
है पर यही विडम्बना, हम मानव नही रह सकते कोरे।।
रोज लिखे जाते हमारे मन के कोरे कागज पर,
नया इतिहास।।
नही ताकत हममे संवेदनहीन होने की,
नही हो सकते हम कोरे,
क्योंकि यह जीवन चलचित्र है,
जहाँ नित नई कविता जन्म लेने को व्यग्र है।।।
-पदमा राय

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