ओ अस्ताचल के सूरज तू , इतना कैसे जल पाता है
अंशु के ज्वाला के संग , कैसे प्रीत निभा पाता है?
युग बीते सदियां बीतीं,
ना तू कभी इतिहास बना
ना तो पिघला न तो रोया
ना कुछ पाया ना कुछ खोया
न तो ऐसा तेज किसी का
ना किसी की गाथा है
ओ अस्ताचल के सूरज तू , इतना कैसे जल पाता है?
तृष्णा में जलती आभा
कहाँ से तुझको मिलती है
ग्रहों की चाल, नक्षत्रों की माया
कैसे राह बदलती हैं।
अनीश्वर है तू दिनकर,तू ही भाग्य विधाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।
तू ही माया, तू ही छाया
जीवन ज्योति जलाने वाले
सबको राह दिखाने वाले
बन ज्योति मृगांक की
शीतलता से नहलाने वाले
फूलों की मादक खुश्बू को, कैसे तू महका पाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।।
स्वर्ण किरण के रथ पर,
बैठ कहाँ से आता है,
अदिति माँ के पुत्र बन
ममता का वचन निभाता है।
ॐ भूर्भुवः स्व से मिलकर , तू पूजनीय बन जाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।।
-पदमा
अंशु के ज्वाला के संग , कैसे प्रीत निभा पाता है?
युग बीते सदियां बीतीं,
ना तू कभी इतिहास बना
ना तो पिघला न तो रोया
ना कुछ पाया ना कुछ खोया
न तो ऐसा तेज किसी का
ना किसी की गाथा है
ओ अस्ताचल के सूरज तू , इतना कैसे जल पाता है?
तृष्णा में जलती आभा
कहाँ से तुझको मिलती है
ग्रहों की चाल, नक्षत्रों की माया
कैसे राह बदलती हैं।
अनीश्वर है तू दिनकर,तू ही भाग्य विधाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।
तू ही माया, तू ही छाया
जीवन ज्योति जलाने वाले
सबको राह दिखाने वाले
बन ज्योति मृगांक की
शीतलता से नहलाने वाले
फूलों की मादक खुश्बू को, कैसे तू महका पाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।।
स्वर्ण किरण के रथ पर,
बैठ कहाँ से आता है,
अदिति माँ के पुत्र बन
ममता का वचन निभाता है।
ॐ भूर्भुवः स्व से मिलकर , तू पूजनीय बन जाता है
ओ अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।।
-पदमा





