Tuesday, June 9, 2020

ओ अस्ताचल के सूरज







अस्ताचल के सूरज तू , इतना कैसे जल पाता है
अंशु के ज्वाला के संग , कैसे प्रीत निभा पाता है?
युग बीते सदियां बीतीं,
ना तू कभी इतिहास बना
ना तो पिघला तो रोया
ना कुछ पाया ना कुछ खोया
तो ऐसा तेज किसी का
ना किसी की गाथा है
अस्ताचल के सूरज तू , इतना कैसे जल पाता है?
तृष्णा में जलती आभा
कहाँ से तुझको मिलती है
ग्रहों की चाल, नक्षत्रों की माया
कैसे राह बदलती हैं।
अनीश्वर है तू दिनकर,तू ही भाग्य विधाता  है
अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।
तू ही मायातू ही छाया
जीवन ज्योति जलाने वाले
सबको राह दिखाने वाले
बन ज्योति मृगांक की
शीतलता से नहलाने वाले
फूलों की मादक खुश्बू कोकैसे तू महका पाता है
अस्ताचल के सूरज तू, इतना कैसे जल पाता है।।
स्वर्ण किरण के रथ पर,
बैठ कहाँ से आता है,
अदिति माँ के पुत्र बन
ममता का वचन निभाता है।
भूर्भुवः स्व से  मिलकर , तू पूजनीय बन जाता है
अस्ताचल के सूरज तूइतना कैसे जल पाता है।।
                                             -
पदमा


Sunday, June 7, 2020

कृषि क्रांति का शंखनाद


सागर में बिखरे अनंत मोती की भांति
चुन लेती हूं एक मोती
वर्ण और व्यंजनों से भी परे, लिखना चाहती हूं उस धवल मोती का इतिहास।
यही वो मोती है जो भारत कहलाता है
जिसका इतिहास ही बना है कृषि से
कृषि कर्मणो ने बहाये हैं मोती से पसीने
खींच रेखाएं धरती पर बनाये मेड़, नालियां और सुरम्य क्यारियां।
सूरज की श्वेत किरणों ने भी कहा होगा चहक कर
गढ़ो इतिहास,अलंकृत करो खेत,नवोद्भिद्(अंकुरित) होने दो बीजों को।
बनाओ कृषि ऋषि,करो कृषि क्रांति का शंखनाद।
हे कृषि ऋषियों ,भर दो अन्न के गार घरों में,
सोंधी गुड़ की महक फैलने दो फिजाओं में,
उगाओ हल्दी ,ताकि लगा सकें वर वधू और नए जीवन की कर सकें शुरुआत।
मुंग ढैंचा सनई और तिल से खेतों को उर्वर कर दो।
महक जाने दो बाग़ को आम अमरुद बेल और कटहल से। हे कृषि ऋषि, हे अन्नदाता,तेरा उपकार है हमपर।
धुप पानी बरसात और नींद की ,की नही परवाह।
यही गांव है ,जवार है,खेत है ,जहाँ दिखती हैं बाल्टियां दूध से भरी।
तन पर झीने वस्त्र डाले, हल्की पीली अचकन में ये कृषि ऋषि कहीं ऊँचे हैं हमसे।
पग फटे, शीश पर बांधे गमछे का पाग
बरसीम और गन्ने से लदे हुए, खेत से घर तक की मंजिल ,नापते हुए देखा है।
मैंने देखा है अपने खेतों में ,कृषि ऋषि और कृषि वैज्ञानिक के अद्भुत सफल संगम को,
जो मोती से चमकते हुए नया इतिहास गढ़ रहे है है और चल पड़े हैं अविरल गंग धार सी।
प्रफुल्लित हूं कि जनम लिया वहां जहां आज भी भोर में कोई जगाता है दौड़ता है,
अपने खेतों की तरफ मिलने उससे गले और विहँस पड़ते खेत अपने अन्नदाता के पुकार पर।

Monday, June 1, 2020

तुम अधूरे नही

तुम अधूरे नही तुम अभागे नही
बात इतनी सी है आप जागे नही
तुम रोते रहे ,वक़्त खोते रहे
कुछ पाने की बेला में सोते रहे
मेहनत को तुम आजमाते नही
तुम अधूरे नहीं तुम अभागे नही।
जिस माटी से जागे उसी से फिर  भागे
न तन को भिगोया न मन को ही धोया
बस ईंटों के घर तुम सजाते रहे
तुम  अधूरे नही तुम अभागे नही।।
न दिए की लौ बन पाए
न ही उसकी बाती
ना धारा बन पाए तुम
मदमाती लहराती।
ना कोमल सी दूब बने
ना नदिया घहराती।
क्यों लौ हिय की जगमगाते नही
तुम अधूरे नही तुम अभागे नही।

                         -पदमा


कैकेयी

कैकेयी के माथे का दाग भला कहीं मिट पायेगा
लाख मिटाओ अश्रु से कभी नही धूल पायेगा
ममता से परिपूर्ण थी
नारी तू संपूर्ण थी
दशरथ की भी प्यारी थी
 कैकेय की राजदुलारी थी
मंथरा की बातों में आकर 
वन भेजा भगवान् को
विदुषी होकर भी तूने
ना पहचाना इंसान को
नफरत का बीज तूने बोया
स्वर्ण से पुत्रों को खोया
कैसे करेगी पश्चाताप
लगा कर हृदय पर आघात
बनी कुमाता रही ना माता
मंथरा सी दासी न हो कैकेयी सी माता
पुत्र कुपुत्र भले रहे माता ना रहे कुमाता
ये कथा नही मिट पायेगी
अनंतकाल तक जायेगी
है सहानभूति तुझसे मेरी 
पर मैं कुछ नही कर पाऊँगी
हरि अनंत हरि कथा अनंता
राम कथा मैं गाऊंगी।।।
                              -पदमा



मुझे स्वप्न में रहने दो

मुझे स्वप्न में रहने दो
निर्झर सा मुझको बहने दो
शनै शनै लहरों सी चलती
मधुर गीत बनाने दो।
लड़ने दो आंधी से मुझको
 पत्थर से टकराने दो
मत रोको कोई राह मेरी
जीवन का दीप जलाने दो।
हाँ उड़ती हूं तो उड़ने दो
व्यंग बाण तो सहने दो
गिरती हूं तो गिरने दो
मिटती हूं तो मिटने दो।
बनने दो मुझको पत्थर
जाने दो मुझको मुक्त हवा में
खुलकर सांस तो लेने दो
लय संगीत तो देने दो।
फिर फिर ना आने पाऊँगी
यहीं कहीं मिट जाउंगी
जो राह चुनी है मैंने
उसको तो सरल बनाने दो
गीत ख़ुशी के गाने दो।।
                          -पदमा

दीप जलाएं

दीप जलाएं, मन में, जीवन में..
उज्ज्वलता दीपक में नहीं, उसके लौ में है.
प्रकाशमान करो असहायों के जीवन को,
प्रस्फुटित करो मन को सुन्दर विचारों से,
कुछ दीपक दीवालों पर सजाओ,
कुछ को अंतर्मन में जलाओ..
सुनो की दीपक क्या कहता है !!
विस्तारित करो हृदय को.. ढूंढो ईश्वर को लौ की रौशनी में..
विशालतम तम को भेद देता जिस तरह,
किसी निर्बल के जीवन में भर दो प्रकाश...
विशाल जलधि की शांति की तरह, ये लौ भी है प्रतिक शांति की..

अपने मन में आये विचारों को मैंने बस शब्द दिए हैँ..
भूरि भूरी धन्यवाद करती हूँ उनका जिन्होंने आज दीपक जलाने की, कुछ लिखने की प्रेरणा दी....