कैसा ये पाप है,क्यों ये संताप है
ये क्या इशारे हैं,कैसे हुए नज़ारे हैं
रुदन का करुण शोर है
ये कैसी भोर है
हर कोई चीत्कार रहा
नभ क्यों हुंकार रहा
कैसा समय आया है, हर कोई भरमाया है
कहीं कोई गहन साया है
सड़कों पर लोग गिर रहे
काल कवलित हो मर रहे।
ये कैसा निनाद है, हो रहा सब खाक है
काल क्यों विहँस रहा, लक्ष्य को ही डस रहा।
विवेचना सुसुप्त है, क्या कहीं कुछ गुप्त है?
मनुष्य का ही कृत्य है, विनाश में ही लिप्त है।
जागो हे मानव, बनो न तुम दानव
हो न तू स्वार्थी, बनो परमार्थी
पक्षियों का फिर शोर हो
एक नई भोर हो
चलो काल को हराते है
नया गीत फिर गाते हैं।।
- वर्तमान स्थिति के परिपेक्ष्य में मन के भावों को लिखने की कोशिश की है।।
- पदमा

No comments:
Post a Comment