Sunday, May 31, 2020

गंगा तू भी रोई होगी


हे गंगा तू भी रोई होगी
रातों को न सोयी होगी
शिव की थीं तुम प्रियतमा
चंद्र की थीं ज्योत्सना
फिर क्या ऐसा श्राप मिला
क्योकर तेरा फिर हृदय जला
मन की आंच भिगोई होगी
गंगा तू भी रोई होगी।
जल होकर भी प्यासी थी
तम की सी उदासी थी
शिव की जटा से निकली होगी
स्वर्ग भूमि से फिसली होगी
बीज तितिक्षा का बोई होगी
गंगा तू भी रोई होगी।
मान रखा भागीरथ का
सुख दिया सब तीरथ का
मनुष्यता का उद्धार किया
अपना जल विस्तार किया
यादें बहुत संजोयी होंगी
गंगा तू भी रोई होगी।
मन को धोया तन को धोया
चैतन्य को धोया अवचेतन को धोया
प्रस्तर को काटा राह बनायीं
सधी रही तू न उफनाई
अपनों को तू भी खोयी होगी 
गंगा तू भी रोई होगी।
देवव्रत सा तनय दिया
विवश हो के विनय किया
जनज(पुत्र) मुझे अब जाने दो
सरस नीर सा बहने दो
मन का दीप जलायी होगी 
गंगा तू भी रोई होगी।।
                - माँ गंगा के धरा पर अवतरित होने का जो दृश्य रहा होगा वो कल्पना लिखने का छोटा सा प्रयास है मेरा।।
                      -पदमा

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