Friday, May 29, 2020

पाखी

जेठ की तपती साँझ में, झुलसते पेड़ों की तपन
तन मन को भी मानो जला देने को आतुर
मैं, खड़ी थी छत के किनारे ताकि
कोई ठंडी बयार आके मुझे छू जाये
तभी दो छोटे निरीह परिंदों को
देखा कुछ तिनके चोंच में दबाये
मुंडेर के पास उगे सघन वृक्ष पर
बैठ जाते हैं।
बनाते देखा, एक एक तिनके को सजाते देखा
क्रमश: होती ये आवृति देखी
बरसात के पहले घोंसला सजाने की ललक देखी
पानी धूप से बचने की जुगत देखी
अच्छा लगा।
अपनी गति और उड़ान को , दरों दीवारों से दूर
उन्मुक्त गगन के पटल पर तैरते हुए
क्षितिज को छू लेने की कसक देखी।।
पदमा -


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