एक नारी,तलाशती अपने अस्तित्व को,
झांकती मन के भीतर।
पूछती है महापुरुषों से,
क्यों बरसाते हो अंगारे मन के घावों पर,
क्यों विश्वास नही करते स्री की सफलता पर?
क्यों कमतर आंकते हो हमको,
या फिर पुरुष होने का दंभ दिखाते हो?
क्यों नही समझते की,
एक स्त्री ही तुम्हारी माँ है,बहन है,बेटी है,पत्नी है ।।
एक स्त्री जीना चाहती है ,
मरने मत दो उसकी अभिलाषाओं को।
मत काटो पर उनके,
विचरने दो स्वछन्द आसमान में,
मत दो ताने स्त्री होने का।
एक स्त्री, अपराजिता भी है,सीता भी है,दुर्गा भी है,
जीवन का पहिया भी है।
हे पुरुष क्या चल सकते हो अकेले?
नही,हमारे बिना तुम्हारा अस्तित्व ही नही।।
एक स्त्री नही कहती की मानो हमें पूजनीय,
दो हमें तारे और चाँद,
उसे तो बस दो थोड़ा सम्मान और स्वछंदता।।
यही वो विश्व है,जहाँ नारी सती सीता हैं,
यही वो विश्व है,जहाँ भागवत गुरु ग्रंथ गीता हैं।
उदय का फिर दिवस लाओ,नारी का सम्मान करो।
औरत है वो , सामान नही,मत उसका अपमान करो।।

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