Sunday, May 31, 2020

नही देखती अब रामायण

नही देखती अब रामायण,
नही हैं राम मेरे आदर्श।!
रघुकुल रीत सदा चली आयी,
प्राण जाये पर वचन न जाई।।
फिर हे राम क्यों वचन नहीं निभाया सीता से,
वन गमन की साथी थीं वो,
सात जन्मों का वादा था,हिय की प्रतिमा थीं सीता,
राम ने कहाँ रोका?
क्या प्रेम नहीं उपजा जब वंश बेल पुष्पित हुआ?
हृदय के साथी को छोड़ क्यों वन में छोड़ा उनको,
क्या राजधर्म निभाने में मन की व्यथा भूल गए?
या पुरुषोत्तम कहलाने को ,दूर कर दिया प्रियतमा को।।
क्यों मिथिला की बेटी ,रानी से यूँ रंक बनी,
चुभते होंगे जिनको पुष्प, अब पाषाण बना बिछौना।।
पिता की प्यारी, माँ की राजदुलारी,
काटा क्यों वनवास?जीवन की सहचरी को क्यों राम ने दूर किया,
क्या किसी के कहने भर से मन मैला हो जाता है?
पूछ लेते अगर एक बार, कि
हे सीता!क्या ये सच है?
शायद फिर न देतीं वो अग्नि परीक्षा।।
क्यों राम! स्री ही क्यों दे अग्नि परीक्षा!
क्यों नहीं कहते की सीता तुम सदैव मेरी ही रहोगी।।
अब नहीं दोगी अग्नि परीक्षा, अब नहीं सहोगी एकांकीपन।।
अब नहीं रोएंगे कोई जनक,
अब ना होगा किसी माता का हृदय विकल।।
हे राम के अनुयायियों, ये मेरे स्वयं के विचार हैं,
अन्यथा ना लेना।। धन्यवाद
- पदमा राय
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और तुम चले गए

बहुत कुछ बाकी था,
और तुम चले गए।
अभी तो अथक प्रयास करने थे ,
और तुम चले गए।
अभी तो सुनहरी जिंदगी के ताने बाने बुनने थे,
और तुम चले गए।
अभी छूना था और आसमान,
और तुम चले गए,
अभी करनी थीं और इबाततें,
और तुम चले गए।
अभी तुम्हें देखना और बाकी था,
अभी खिंचनी थी और लकीरें,
अभी और दूर जाना था,
अभी जीनी थी और जिंदगी,
और तुम चले गए।।
अभी समाज के आईने को लाना था और सुनहरे परदे पर,
और तुम चले गए।।।।
-मेरी श्रद्धांजलि ,Lt.Irfan Khan and Lt.Rishi Kapoor ji ko...एक अपूर्णीय छति सिनेमा जगत को..

स्तब्ध हूं

स्तब्ध हूं, निःशब्द हूं, व्याकुल हूं, शोकाकुल हूं।।
मन करता है आज, उड़ेल डालूं विचारों को,
जो अब तक है मन में भरा,
खोल डालूं जीवन की किताब,
जो अब तक था कहीं धरा।।
मासूम हृदय हम मानव का,
लग जाते हैं जल्दी यहाँ घाव,
मौत ही तो है ,वो आएगी,रुलायेगी,ले जाएगी।।
महसूस हो रहा यूँ,जैसे कई परिंदे एक साथ जगत को छोड़ चले हैं,
कई कोशिशें नाकाम हो रही हैं,
कहीं कोई हलचल नहीं, कहीं कोई अकुलाहट है,
जो कर रही मन को विकल।।
आज लगा, जिंदगी अपना रास्ता खुद चुनती है।।
अभी अभी तो सफलता ने मुझे पुकारा था।।
फिर हे प्रभु!क्यों सब कुछ मौन है?
क्यों थिर है राहें?
क्यों हम सब हार रहे प्रकृति से?
हे आराध्य, तोड़ो अब मौन को,
खोलो मंदिरों के पट,
विराजो फिर पहाड़ों पर,
अब व्यस्त होने का मन करता है,
अब उड़ने का मन करता है।।
बहुत हो गया,रुक जाओ परिदों,न जाओ।।
जीवन से भरी आँखें, तू कौन है?
हो रहा आज क्यों तू मौन है?

अपराजिता

एक नारी,तलाशती अपने अस्तित्व को,
झांकती मन के भीतर।
पूछती है महापुरुषों से,
क्यों बरसाते हो अंगारे मन के घावों पर,
क्यों विश्वास नही करते स्री की सफलता पर?
क्यों कमतर आंकते हो हमको,
या फिर पुरुष होने का दंभ दिखाते हो?
क्यों नही समझते की,
एक स्त्री ही तुम्हारी माँ है,बहन है,बेटी है,पत्नी है ।।
एक स्त्री जीना चाहती है ,
मरने मत दो उसकी अभिलाषाओं को।
मत काटो पर उनके,
विचरने दो स्वछन्द आसमान में,
मत दो ताने स्त्री होने का।
एक स्त्री, अपराजिता भी है,सीता भी है,दुर्गा भी है,
जीवन का पहिया भी है।
हे पुरुष क्या चल सकते हो अकेले?
नही,हमारे बिना तुम्हारा अस्तित्व ही नही।।
एक स्त्री नही कहती की मानो हमें पूजनीय,
दो हमें तारे और चाँद,
उसे तो बस दो थोड़ा सम्मान और स्वछंदता।।
यही वो विश्व है,जहाँ नारी सती सीता हैं,
यही वो विश्व है,जहाँ भागवत गुरु ग्रंथ गीता हैं।
उदय का फिर दिवस लाओ,नारी का सम्मान करो।
औरत है वो , सामान नही,मत उसका अपमान करो।।
-पदमा राय

समय कहाँ मैं वापस पाऊं

दिन बीते बहुतेरे,
समय कहाँ मैं वापस पाऊं?
उजड़ राह पर, सुघड़ चाल सी,
कवित्व कहाँ से लाऊं?
जीवन के आधे में आयी, वो कोमलता कैसे बिसराऊँ?
बरगद की छाया सी होकर,
पूर्ण शुन्य से पूर्ण शेष तक,
मैं कैसे बन जाऊं?
बनती हूँ गर पुजा की थाली,
पुष्प कहाँ से लाऊं?
थिरकती नदी में पग रखती हूं तो,
माँझी किसे बनाऊं?
पूजूँ गर मैं कृष्ण कन्हैया,
कदम्ब की डाल, कहाँ से लाऊं?
घिरी हूं आडंबरों से,
स्वं प्रभा सी हुई नही,
समरसता की खोज में भटकूँ, राही हूं अनजान डगर की,
सूनेपन को भरने को मैं,
शब्द कहाँ से लाऊं।।।?
-खुद को याद करने का प्रयास भर था ।।
- पदमा राय

मन के कोरे कागज पर

पलट रही हूं पन्ने दर पन्ने,
शब्द आज कुछ रूठे से हैं।
शायद कहना चाह रहे हैं,कोरे ही रहने दो मुझे।
मत सजाओ मुझे स्याही की लकीरों से।
सहज ही रहने दो,मत खींचो तस्वीर।
आज रुक जाओ मत करो मन के तार झंकृत।
हो जाने दो मुझे सँवेदनहीन,
सुनने दो कुछ आहट, और गहराने दो कोरेपन को।
मैं भी नि:शब्द हूं पन्ने की इस वेदना को सुनकर।।
शायद अच्छा है मुझसे ये पन्ना।
कम से कम ले पाते हैं साँस कोरे रहकर।
है पर यही विडम्बना, हम मानव नही रह सकते कोरे।।
रोज लिखे जाते हमारे मन के कोरे कागज पर,
नया इतिहास।।
नही ताकत हममे संवेदनहीन होने की,
नही हो सकते हम कोरे,
क्योंकि यह जीवन चलचित्र है,
जहाँ नित नई कविता जन्म लेने को व्यग्र है।।।
-पदमा राय

मेरी कविता,मेरा अस्तित्व

मेरी कविता,कुछ छंदबद्ध कुछ छंदमुक्त
बोलती हैं मुझसे ,अभी मैं अपरिपक्व हूं
अभी और रंग भरो इसमें
और लय दो,और संवारो मुझे दुल्हन की तरह।
और नए शब्द गढ़ो
और पारदर्शी करो आँखों की पुतलियों सी।।
मेरी कविता,मैंने कहा- मत हो गतिमान
चल सीधी सपाट सरल सी
मत दिखा व्यग्रता सबसे अलग हो जाने की
मिल जा सबमे अनमिल सी होकर।
मेरी कविता,मत रूठना मुझसे
तुझसे मेरा अस्तित्व है
तू मुझमे है।लोग हँसते है,हंसने दो।
कुछ समय बाद हो जाओगी तुम कालातीत
मेरी कविता, पी लेना विष के घूंठ।
पर रहना उन्मुक्त, स्वछन्द, खुद मेँ खोये
पूछना अपनी आत्मा से
क्या कवित्व की पंक्तियाँ सिकुड़ रही हैं?
क्या क्षितिज के उस पार से
कोई है जो तुझे सजा रहा है
पीत रौशनी की गझिन आभा से?
- पदमा